Saturday, 11 March 2017

क्यूंकि नशे में कोई झूठ नही बोलता







शराब सा हिसाब होने दो,
पहले मोहब्बत होने दो, फिर इन्कलाब होने दो I
क्यूंकि नशे में कोई

झूठ नहीं  बोलता...






उस कल,उस पल, उस मोहब्बत के लिए

चलो न एक करार करते हैं, 
थोडा सा प्यार करते हैं .

आज एक अरसे बाद तुमसे बात करने में बिलकुल वैसा ही लग रहा था,
जैसे कि कोई परदेशी एक अरसे बाद वापस गाँव आया हो, 
और बड़ी बेशब्री से इधर उधर ताकता है, कि कोई  उसे पहचान ले 
या कोई उसकी पहचान का दिख जाये  
लेकिन उसकी निराशा के लिए ऐसा बिलकुल नही हुआ,
न तो कोई उसकी पहचान का दिखा, ना ही किसी ने उसे पहचाना 

तुमसे बतियाना बिलकुल वैसा ही है, 
हम बदल चुके हैं,  या बदल जाने की एक्टिंग तो अच्छी ही कर ले रहे हैं, 
तुम्हे भी पता है की क्या क्या भूल जाना है,
मुझे भी तकाज़ा है की क्या याद नही रखना

तो चलो न एक करार करते हैं ,
उस कल, उस पल, उस मोहब्बत के खातिर 
थोडा सा प्यार करते हैं .

हम उन शामो की बात नही करेंगे जब हम VC ऑफिस में स्लो मोशन में वाक करते थे,
मैं सीधे पांव और तुम उलटे पांव चलती थी,
और मेरी किसी थर्ड क्लास शायरी पर मुह फाड़ के हंस देती थी,
हम इस बात का भी ज़िक्र नही करेंगे की कैसे तुम्हे रोड क्रॉस करने में डर लगता है,
और तुम्हारा ये डर हमे और करीब ले आता, 
जब तुम मेरा हाथ पकडती थी रोड के उस पार तक 

इस बात का भी ज़िक्र नही होगा की कैसे हम घंटो मोदी के बारे में बात करते थे,
मैं हमेशा की तरह उसके खिलाफ और तुम उसके समर्थन में, पुरजोर समर्थन में.
नोटबंदी के दौर में भी  

तो चलो न एक करार करते हैं,
उस कल, उस पल , उस मोहब्बत के लिए 
थोडा सा प्यार करते हैं.

तुम कहती थी न, दुनिया के लिए मैं जितनी शरीफ हूँ, ज़रीन हूँ ,
तुम्हारे लिए उतना ही बिगड़ने का मन करता है, 
की कैसे तुमने मुझे अपनी बनावट के एक एक बारीकियां बताई थी,
जिसकी गवाही हमारी परम्पराएं नही देती,
परंपरा से याद आया, तुम्हे वो बजरंगदल और वैलेंटाइन्स की डिबेट तो याद ही होगी हमारी,
तुम कहती थी, प्यार करते हैं चोरी थोड़ी, जो छुप छुप करें, 
मैं कहता था, प्यार दर्शन की चीज़ हैं, प्रदर्शन की नही,
फिर तुम मुझे डरपोक,फट्टू जाने क्या क्या बोलती थी,
वो सब भूल गया हूँ मैं, तुम भी याद मत रखना 
हम इस पर भी बात नही करेंगे

लेकिन उन तमाम जस्बातों, उन एहसासों, उस मोहब्बत के खातिर 
चलो न एक करार करते हैं, 
थोडा सा प्यार करते हैं. 


अस्सी घाट की झुमके वाली वो दूकान, जहाँ मेरी तुम्हे झुमका दिलाने की जिद ले गयी थी,
वहां तुमने झुमका पहनते वक्त कैसे अपने कान आगे करके बोला था कि, 
तुम ही पहना दो.
वो, जब मैं तुम्हारे कानों में झुमका डाल रहा था, और तुम आईने में देख के बोली थी,
हम साथ में कितने अच्छे लगते हैं न

देखो ऐसा है की , तुम्हरी यादें भोर में कम्बल की नर्म गर्माहट सी हैं,
जिन्हें छोड़ने का मन तो नही करता, लेकिन छोड़े बिना काम भी नही चलता.
तुम अलसाई आँखों के ख्वाब सी हो, 
जिसे पूरा करने की जिद भी होती है,
और इसका भी तकाज़ा होता कि, ऐसा हो नही सकता.

तो चलो हम थोड़ी देर के लिए एक करार करते हैं,
थोडा सा प्यार करते हैं 



- गौरव प्रकाश शाह 

10 comments:

  1. पहले मुहब्बत होने दो, फिर इन्कलाब होने दो। ❤

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    1. <3 tumhe pasand aaya, kosishein mukammal huyi meri :)

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  2. Kya gazab h....is shaandaar kavita ka kbhi vistrit chitra sunaiye hme bhaiya

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  3. जिओ राजा क्या आगाज किये हो ।

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  4. अब जाकर लग रहा है की GPS signal बराबर मिल रहा है । हई शाबाश

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  5. भैया काफी समय हो गया..ये मार्केट आपसे कुछ नया चाहता है अब...इस कविता के बाद लोगों का लालच बढा़कर आप बैठे हैं बताइये ...ई अच्छा बात नहीं है..

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